अपनी हर बीमारी और समस्या का समाधान भगवान शंकर की इस ध्यान साधना से दूर करे ।

                भगवान शंकर की ध्यान साधना

 सुंदर वृंदावन में कल्पवृक्षके नीचे सुरम्य रत्नसिंहासनपर भगवान् श्रीकृष्ण श्रीप्रियाजीके साथ विराजमान हैं। श्रीकृष्णका वर्ण नवजलधरके समान नील-श्याम है, पीताम्बर धारण किये हुए हैं, द्विभुज हैं, विविध रत्नोंकी और पुष्पोंकी मालाओंसे विभूषित हैं, मुखमण्डल करोड़ों चन्द्रमाओंसे भी सुन्दर है। तिरछे नेत्र हैं, ललाटपर मण्डलाकृति तिलक हैं, जो चारों ओर चन्दनसे और बीचमें कुङ्कुमबिन्दुसे बनाये हुए हैं। कानोंमें सुन्दर कुण्डल शोभायमान हैं, उन्नत नासिकाके अग्रभागमें मोती लटक रहा है। पके बिम्बफलके समान अरुणवर्ण अधर हैं, जो दाँतोंकी प्रभासे चमक रहे हैं। भुजाओंमें रत्नमय कड़े और बाजूबंद हैं और अँगुलियोंमें रत्नोंकी अँगूठियाँ शोभा पा रही हैं। बायें हाथमें मुरली और दाहिनेमें कमल लिये हुए हैं। कमरमें मनोहर रत्नमयी करधनी है, चरणोंमें नूपुर सुशोभित हैं। बड़ी ही मनोहर अलकावली है, मस्तकपर मयूरपिच्छ शोभा पा रहा है। सिरमें कनेर के पुष्पोंके आभूषण हैं। भगवान्‌की देहकान्ति नवोदित कोटि-कोटि दिवाकरोंके सदृश स्निग्ध ज्योतिर्मय है। उनके दर्पणोपम कपोल स्वेदकणोंसे सुशोभित हैं। चञ्चल नेत्र श्रीराधिकाजीकी ओर लगे हुए हैं। वामभागमें श्रीराधिकाजी विराजिता हैं, तपे हुए सोनेके समान उनकी देहप्रभा है, नील वस्त्र धारण किये हैं, मन्द मन्द मुसकरा रही हैं। चञ्चल नेत्रयुगल स्वामीके मुखचन्द्रकी और लगे हुए हैं और चकोरीकी भाँति उनके द्वारा वे श्याम-मुख-चन्द्र-सुधाका पान कर रही हैं। अङ्गुष्ठ और तर्जनी अँगुलियोंके द्वारा वे प्रियतमके मुखकमलमें पान दे रही हैं। उनके गलेमें दिव्य रत्नोंके और मुक्ताओंके हार हैं। क्षीण कटि करधनीसे सुशोभित है। चरणों में नूपुर, कड़े और चरणाङ्गुलियोंमें अङ्गुलीय आदि शोभा पा रहे हैं। उनके प्रत्येक अङ्ग-प्रत्यङ्गसे लावण्य छिटक रहा है। उनके चारों ओर तथा आगे-पीछे यथास्थान खड़ी हुई सखियाँ विविध प्रकारसे सेवा कर रही हैं। श्रीराधिकाजी कृष्णमयी हैं, वे श्रीकृष्णकी आनन्द- | रूपिणी ह्रादिनी शक्ति हैं। त्रिगुणमयी दुर्गा आदि शक्तियाँउनकी करोड़वीं कलाके करोड़वें अंशके समान हैं। सब कुछ वस्तुतः श्रीराधाकृष्णसे ही भरा है। उनके सिवा और कुछ भी नहीं है। यह जड़-चेतन अखिल जगत् श्रीराधाकृष्णमय है—



चिदचिल्लक्षणं सर्वं राधाकृष्णमयं जगत् । परन्तु वे इतने ही नहीं हैं। अनन्त अखिल ब्रह्माण्डसे परे हैं, सबसे परे हैं, सबके अधिष्ठान हैं, सबमें हैं और सबसे सर्वथा विलक्षण हैं। यह श्रीकृष्णका किञ्चित् ऐश्वर्य है।


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